दान दाता और दान ग्रहण करने वाला — सम्पत्ति का स्वामी नहीं
जगत्-रचना और सम्पत्ति का मूल स्वामी रचयिता है। दाता और ग्रहणकर्ता केवल व्यवस्था करने वाले हैं — न कि अन्तिम स्वामी।
दान देने या लेने वाला व्यक्ति किसी भी वस्तु (अनाज, फल-फूल, धन, पशु-पक्षी आदि) का अंतिम स्वामी नहीं होता। यह सत्य निम्न बातों से स्पष्ट है:
- रचना-क्रम: पहले सूरज-धरती-चन्द्रमा आदि बने; फिर इन पर वनस्पति और जीवो का निर्माण हुआ — इसलिए सम्पत्ति की उत्पत्ति रचयिता-निर्मित है। यह स्वतः सिद्धान्त पर आधारित रचना है
- स्वामित्व का सिद्धांत: दान दाता और दान प्राप्तकर्ता केवल व्यवस्थापक हैं — वे केवल देने/लेने की क्रिया में संलग्न होते हैं।
- हक़-हिसाब नहीं: कोई भी मानव यह दावा नहीं कर सकता कि वह सम्पत्ति का परम स्वामी है; इसलिए 'दान देने का अंतिम अधिकार' किसी व्यक्ति या संस्था के पास नहीं ठहरता।
संदेश — स्पष्ट और सरल
दान करते समय और दान ग्रहण करते समय इन्हें याद रखें:
- दान दाता सम्पत्ति का मालिक नहीं — वह केवल सौप रहा है।
- दान प्राप्तकर्ता भी सम्पत्ति का स्वामी नहीं — उसे केवल प्रयोग/बटवारा करने की ज़िम्मेदारी मिली है।
- संपत्ति का अंतिम स्रोत रचयिता है — इस दृष्टि से दान-प्राप्ति और दान-प्रदान एक पवित्र व्यवस्था है, अधिकार नहीं। अतः सम्पत्ति स्वामी कभी भी दोनों पक्ष से सम्पत्ति ले सकते हैं
निष्कर्ष:
दान-व्यवस्था पर प्रभुत्व का दावा नहीं किया जा सकता — यह सभी के लिए समवाँय और पारदर्शिता का विषय होना चाहिए।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आध्यात्म ब्यापार नहीं उपासक परेशान हो गया इस पर प्रतिबन्ध लगेगा
आध्यात्म शास्त्र स्वामी की सम्पत्ति से संसार जीव-जंतु वनस्पति और पिण्ड नहीं बना